ग्रहों की उच्चतम
(Exaltation) और नीचतम (Debilitation) डिग्री
वैदिक ज्योतिष में, ग्रहों की उच्च (Exaltation) और नीच (Debilitation) स्थिति उनके
बल (Strength) और फलादेश की क्षमता को दर्शाती है।
परम उच्च (Deep Exaltation) डिग्री वह सूक्ष्म बिंदु है जहाँ ग्रह अपना अधिकतम शुभ
बल प्राप्त करता है, और परम नीच (Deep Debilitation) डिग्री वह बिंदु है जहाँ ग्रह
सबसे कमजोर और अशुभ फल देने वाला हो जाता है।
1. सात प्रमुख ग्रहों (सूर्य से शनि) की परम डिग्रियाँ
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ग्रह (Planet)
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परम उच्च राशि (Deep Exaltation Sign)
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परम उच्च डिग्री (Deep Exaltation Degree)
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परम नीच राशि (Deep Debilitation Sign)
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परम नीच डिग्री (Deep Debilitation Degree)
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सूर्य (Sun)
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मेष (Aries)
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10°
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तुला (Libra)
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10°
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चंद्रमा (Moon)
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वृष (Taurus)
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3°
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वृश्चिक (Scorpio)
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3°
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मंगल (Mars)
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मकर (Capricorn)
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28°
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कर्क (Cancer)
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28°
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बुध (Mercury)
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कन्या (Virgo)
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15°
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मीन (Pisces)
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15°
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बृहस्पति (Jupiter)
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कर्क (Cancer)
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5°
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मकर (Capricorn)
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5°
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शुक्र (Venus)
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मीन (Pisces)
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27°
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कन्या (Virgo)
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27°
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शनि (Saturn)
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तुला (Libra)
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20°
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मेष (Aries)
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20°
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2. उच्च और नीच स्थिति का फलादेशीय महत्व
A. परम उच्च (Deep Exaltation) स्थिति
जब कोई ग्रह अपनी परम उच्च डिग्री के निकट होता है, तो वह अपने नैसर्गिक कारकत्वों
(Natural Significators) और कुंडली में अपने स्वामित्व वाले भावों का सर्वोच्च शुभ
फल देता है।
• सर्वोच्च बल (Maximum Strength): ग्रह को अपने कारकत्वों के लिए अथाह बल प्राप्त
होता है।
उदाहरण: यदि मंगल (शक्ति, भूमि, साहस का कारक) 28° मकर में हो, तो जातक को असाधारण
साहस, उच्च पद और अचल संपत्ति का बड़ा लाभ मिलता है।
• राजयोग की पुष्टि: यदि कोई ग्रह राजयोग (केंद्र-त्रिकोण संबंध) बना रहा हो और वह
परम उच्च हो, तो वह राजयोग निश्चित रूप से फलीभूत होता है और जातक को राजा के समान
सुख, अधिकार और सत्ता प्राप्त होती है।
• दशा फल: ऐसे ग्रह की दशा/अंतर्दशा जीवन का स्वर्ण काल (Golden Period) होती है, जहाँ
कम प्रयास में भी बड़ी सफलता और प्रतिष्ठा मिलती है।
B. परम नीच (Deep Debilitation) स्थिति
जब कोई ग्रह अपनी परम नीच डिग्री के निकट होता है, तो वह सबसे कमजोर हो जाता है और
अशुभ फल देता है।
• बलहीनता (Zero Strength): ग्रह अपने कारकत्वों के माध्यम से संघर्ष, हानि या असफलता
देता है।
उदाहरण: यदि सूर्य (पिता, आत्मा, प्रशासन का कारक) 10° तुला में हो, तो जातक को पिता
से सहयोग की कमी, आत्मविश्वास में कमी, और सरकारी/प्रशासनिक कार्यों में असफलता मिल
सकती है।
• नीच भंग राजयोग: फलादेश में यह देखना अनिवार्य है कि क्या नीच ग्रह किसी नीच भंग
राजयोग में शामिल है। यदि यह भंग हो जाए, तो ग्रह की नीचता समाप्त हो जाती है और नीच
भंग करने वाले ग्रह की दशा में यह शुभ फल देना शुरू कर देता है।
• दशा फल: ऐसे ग्रह की दशा/अंतर्दशा में संघर्ष, रोग, कर्ज और संबंधित भावों की हानि
होती है। यदि यह ग्रह त्रिक भावों (6, 8, 12) का स्वामी हो, तो यह विपरीत राजयोग के
तहत कुछ मामलों में शुभ फल भी दे सकता है।
3. राहु और केतु (छाया ग्रह) की उच्च-नीच स्थिति
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ग्रह (Planet)
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उच्च राशि (Exaltation Sign)
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नीच राशि (Debilitation Sign)
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फलादेश का सिद्धांत
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राहु (Rahu)
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मिथुन (Gemini) या वृष (Taurus)
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धनु (Sagittarius) या वृश्चिक (Scorpio)
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राहु मिथुन राशि में उत्कृष्ट बौद्धिक और तकनीकी
सफलता देता है, जबकि वृष राशि में यह भौतिक समृद्धि देता है।
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केतु (Ketu)
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धनु (Sagittarius) या वृश्चिक (Scorpio)
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मिथुन (Gemini) या वृष (Taurus)
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केतु धनु राशि में आध्यात्मिक ज्ञान और शोध
में सफलता देता है, जबकि वृश्चिक राशि में यह गूढ़ ज्ञान और अलौकिक शक्ति देता है।
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निष्कर्ष
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ग्रह का परम उच्च या परम नीच डिग्री के पास होना फलादेश में निश्चितता लाता है। केवल
राशि में उच्च होने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि ग्रह अपनी विशिष्ट डिग्री से कितना
दूर या पास है।
परम उच्च वर्गोत्तम की
गणितीय सटीकता: D-40 का विशिष्ट विश्लेषण
वैदिक ज्योतिष के सिद्धांत यह स्थापित करते हैं कि किसी भी ग्रह के पूर्णतः शुभ फलादेश
हेतु उसकी परम उच्च स्थिति (Deep Exaltation) और वर्गोत्तमता (Vargottama) का एक साथ
होना अपरिहार्य है। यह संयोजन जातक के व्यक्तिगत भाग्य को अखंड स्वरूप प्रदान करता
है।
प्रस्तुत विश्लेषण यह प्रमाणित करता है कि दशमांश (D-40) कुंडली, अपनी विशिष्ट गणितीय
संरचना के कारण, ग्रहों को उनकी परम उच्च डिग्री के ±0.2° की सूक्ष्म सीमा के भीतर
वर्गोत्तम होने हेतु एक दुर्लभ विन्यास (Rare Configuration) प्रदान करती है, जिससे
अखंड सौभाग्य योग की संभावना अधिकतम हो जाती है।
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1. गणितीय आधार: अंश मान (Amsa Value) का महत्व
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विभागीय कुंडली (Divisional Chart) में वर्गोत्तम स्थिति प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक
है कि जन्म कुंडली (D-1) में ग्रह की डिग्री उस विभागीय चार्ट के किसी विशेष वर्ग
(Amsa) की प्रारंभिक सीमा के भीतर समाहित हो।
A. D-40 कुंडली का अंश मान निर्धारण
D-40 कुंडली में, एक राशि के 30° को 40 समान भागों में विभाजित किया जाता है। इस प्रकार
D-40 का प्रत्येक वर्ग निम्नलिखित अंश मान धारण करता है:
D-40 अंश मान = 30° / 40 = 0.75° (अथवा 0° 45' 00'')
B. परम उच्च वर्गोत्तम हेतु आवश्यक सीमा का निर्धारण
यदि यह शर्त निर्धारित की जाए कि ग्रह अपनी परम उच्च डिग्री से केवल ±0.2° (अर्थात्
±12') के भीतर ही वर्गोत्तम हो, तो D-1 में उस ग्रह की कुल सह्यता सीमा (Tolerance
Limit) 0.4° (या 24') होती है।
चूँकि D-40 का अंश मान (0.75°) इस निर्धारित सीमा (0.4°) से पर्याप्त रूप से अधिक है,
अतः परम उच्च डिग्री के समीपस्थ अंश का D-40 में समावेश सहजता से हो जाता है।
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2. D-40 में परम उच्च डिग्री पर वर्गोत्तम की प्रमाणिक गणना
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ग्रह (Planet)
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उच्च राशि (Uchcha Rashi)
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उच्चतम उच्च डिग्री (Paraam Uchcha Degree)
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±0.2° सीमा में सर्वाधिक उपयुक्त डिग्री
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सूर्य (Sun)
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मेष (Aries)
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10° 00'
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10° 00' 00''
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चंद्रमा (Moon)
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वृषभ (Taurus)
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3° 00'
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3° 00' 00''
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मंगल (Mars)
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मकर (Capricorn)
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28° 00'
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27° 45' 00'' (≈28°)
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बुध (Mercury)
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कन्या (Virgo)
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15° 00'
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15° 00' 00''
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गुरु (Jupiter)
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कर्क (Cancer)
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5° 00'
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5° 00' 00''
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शुक्र (Venus)
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मीन (Pisces)
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27° 00'
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27° 00' 00''
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शनि (Saturn)
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तुला (Libra)
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20° 00'
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20° 00' 00''
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निष्कर्ष:
यह गणितीय गणना स्पष्ट रूप से सिद्ध करती है कि D-40 कुंडली में, अधिकांश ग्रहों के
लिए उनकी परम उच्च डिग्री (±0.2° की सूक्ष्म सीमा में) ही D-40 वर्गोत्तम होने हेतु
सर्वाधिक अनुकूल होती है। यह विन्यास सुनिश्चित करता है कि ग्रह का सर्वोच्च बल (परम
उच्च स्थिति) सीधे जातक के दैवीय सौभाग्य (D-40 द्वारा शासित) के साथ दृढ़ता से जुड़
जाए।
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3. इस विशिष्ट योग का फलादेशीय प्रतिफल
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जब यह सूक्ष्म योग जन्म कुंडली में सक्रिय होता है, तो जातक को जीवन में अटूट सौभाग्य
और अदृश्य संरक्षण की प्राप्ति होती है।
• सर्वोच्च संरक्षण (Supreme Protection): यह योग एक आंतरिक संरक्षणकारी शक्ति का निर्माण
करता है। जातक अकस्मात दैवीय हस्तक्षेप अथवा अदृश्य सहारे के कारण जीवन के गंभीर संकटों
(यथा दुर्घटना, गंभीर रोग, या वित्तीय पतन) से सुरक्षित रहता है।
• पैतृक और आनुवंशिक सुख: व्यक्ति को माता-पिता, परिवार और पूर्वजों के माध्यम से स्थायी
भावनात्मक, स्वास्थ्यगत तथा वित्तीय विरासत की प्राप्ति सुनिश्चित होती है।
• आंतरिक संतुष्टि की निरंतरता: बाह्य परिस्थितियों की अस्थिरता के बावजूद, जातक के
भीतर एक निरंतर शांति और संतुष्टि का भाव बना रहता है, जो इस योग का सबसे विशिष्ट प्रतिफल
है।
यह विश्लेषण प्रदर्शित करता है कि D-40 जैसे उच्च वर्ग चार्ट्स का विश्लेषण करते समय,
डिग्री की सूक्ष्म गणितीय सटीकता ही फलादेश की अंतिम विश्वसनीयता को निर्धारित करती
है।
फलादेश में सटीकता के लिए, यह समझना महत्वपूर्ण
है कि ग्रह अपनी उच्च राशि में भी, केवल परम उच्च डिग्री के निकट ही अपना सर्वोच्च
शुभ फल देता है।
राहु और केतु भौतिक पिंड (Physical Bodies) नहीं
हैं, इसलिए इनकी उच्च और नीच डिग्रियाँ अन्य ग्रहों की तरह निश्चित नहीं होती हैं।
इनके बल का निर्धारण विभिन्न ज्योतिषीय स्कूलों में अलग-अलग ढंग से किया गया है।