वर्ग चार्ट (विभागीय कुंडली): D-40 से D-144 तक सूक्ष्म फलादेश नियम

 

वर्ग चार्ट (विभागीय कुंडली): D-40 से D-144 तक सूक्ष्म फलादेश नियम

यह दस्तावेज़ वैदिक ज्योतिष के सबसे सूक्ष्म और उच्च विभागीय कुंडलियों (Higher Varga Charts)—D-40 (खवेदांश) से लेकर D-144 (द्वादशद्वादशांश) तक—के फलादेश (Predictive Interpretation) के विशेष और गूढ़ नियमों पर केंद्रित है। इन चार्ट्स का विश्लेषण जातक के गहन कर्म (Deepest Karma), आध्यात्मिक भाग्य, और पैतृक विरासत को समझने के लिए किया जाता है।

फलादेश का मूल आधार

इन उच्च वर्ग चार्ट्स (D-N) की सटीकता जन्म समय पर अत्यधिक निर्भर करती है। फलादेश करते समय, ज्योतिषी को निम्नलिखित पर ध्यान देना चाहिए:

  1. D-N लग्नेश का D-1/D-N में बल: वर्ग चार्ट का लग्न स्वामी जितना बलवान होगा, उस क्षेत्र में उतना ही शुभ फल मिलेगा।

  2. कारकांश (Karaka in D-N): ग्रह जिस क्षेत्र का नैसर्गिक कारक है, D-N में उसकी स्थिति उस फल की गुणवत्ता को निर्धारित करती है।

  3. D-60 से पुष्टि: किसी भी उच्च वर्ग चार्ट के फल की पुष्टि षष्ट्यंश (D-60) से करना अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि D-60 कर्म का सबसे सूक्ष्म चित्रण है।

1. खवेदांश (D-40): शुभ-अशुभ फल और माँ का वंश

खवेदांश चार्ट (D-40) को 'पुत्र-पौत्र' वर्ग भी कहते हैं। यह जीवन में व्यक्ति के साथ होने वाले आकस्मिक और अनियंत्रित शुभ या अशुभ घटनाओं की मात्रा को दर्शाता है। यह चार्ट विशेष रूप से माँ के वंश और उससे प्राप्त होने वाले भाग्य या दुर्भाग्य को देखने के लिए उपयोग किया जाता है।

फलादेश नियम

व्याख्या और परिणाम

D-40 लग्न स्वामी

D-40 लग्न स्वामी का D-1 में केंद्र या त्रिकोण में होना जातक के जीवन में आकस्मिक सौभाग्य और सुख को बढ़ाता है।

सुख-दुःख का निर्धारण

D-40 के केंद्र (1, 4, 7, 10) भावों में शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, चंद्रमा) की स्थिति जीवन में अधिक शुभ परिणाम और सुख देती है।

त्रिक भावों का प्रभाव

D-40 के त्रिक भावों (6, 8, 12) में अशुभ ग्रहों का बलवान होना जीवन में अप्रत्याशित दुर्भाग्य, हानि या बार-बार कष्टों को दर्शाता है।

माता की विरासत

D-40 में चतुर्थ भाव (माँ) और एकादश भाव (लाभ) का बल जातक को माँ के परिवार (मामा पक्ष) से धन, लाभ या सहयोग दिलाता है।

2. अक्षवेदांश (D-45): चरित्र, पितृत्व और पैतृक परंपराएँ

अक्षवेदांश चार्ट (D-45) व्यक्ति के चरित्र की नींव, पैतृक परंपराओं, पूर्वजों के कर्मों का प्रभाव और पिता के वंश से प्राप्त होने वाले नैतिक बल को दर्शाता है।

फलादेश नियम

व्याख्या और परिणाम

D-45 लग्न स्वामी

D-45 लग्नेश का D-1 में नवम भाव (पिता/भाग्य) या दशम भाव (कर्म) से संबंध होना व्यक्ति के चरित्र को मजबूत बनाता है और उसे पैतृक गौरव प्राप्त होता है।

पिता की विरासत

D-45 में नवम भाव (पिता/भाग्य) और द्वितीय भाव (धन) का बलवान होना पिता या पैतृक पक्ष से संपत्ति, मान-सम्मान या विचारधारा की विरासत दिलाता है।

चरित्र बल

D-45 के लग्न या दशम भाव पर सूर्य (सत्ता, आत्मा) और मंगल (आत्मविश्वास) का बलवान प्रभाव जातक को नैतिक बल और आत्म-सम्मान देता है।

संस्कार

D-45 में त्रिकोणों (1, 5, 9) का बल जातक के संस्कारों की शुद्धता और धार्मिक आचरण को दर्शाता है।

3. षष्ट्यंश (D-60): गहन कर्म और सूक्ष्म फल

षष्ट्यंश (D-60) को सभी वर्ग चार्ट्स में सबसे सूक्ष्म और सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह ग्रह की स्थिति को $0^{\circ}30'$ (आधा अंश) तक तोड़ता है, इसलिए इसकी सटीकता के लिए जन्म समय का सैकंडों तक सही होना अनिवार्य है। यह चार्ट पूर्व जन्मों के कर्म (Prarabdha Karma) और उसके अंतिम परिणामों को दर्शाता है।

फलादेश नियम

व्याख्या और परिणाम

D-60 लग्नेश

D-60 लग्न स्वामी का बलवान होना जातक के भाग्य को मजबूत बनाता है। लग्नेश का कमजोर होना दर्शाता है कि जातक अपने कर्मों को भोग रहा है और उसे जीवन में अधिक संघर्ष करना पड़ेगा।

शुभ और अशुभ योग

D-60 में ग्रहों के दो प्रमुख वर्गीकरण हैं: शुभषष्ट्यंश (शुभ कर्म) और अशुभषष्ट्यंश (अशुभ कर्म)। यदि कोई ग्रह शुभषष्ट्यंश में हो, तो अपनी दशा में वह शुभ फल देता है, अन्यथा कष्ट।

दशा का सूक्ष्म फल

किसी भी ग्रह की दशा का सूक्ष्म और अंतिम फल उसी तरह होगा, जैसा वह D-60 में स्थित है। D-60 में बलवान ग्रह की दशा जातक को कर्मों के अनुरूप सर्वश्रेष्ठ परिणाम देती है।

मोक्ष और अध्यात्म

D-60 के नवम (धर्म) और द्वादश (मोक्ष) भावों का बल जातक के आध्यात्मिक पथ, मुक्ति और जीवन के अंतिम उद्देश्य को दर्शाता है।

4. उच्चतर अप्रासंगिक वर्ग (D-81, D-108, D-144)

ये चार्ट्स अत्यंत उच्च विभाजन पर आधारित हैं और मुख्य रूप से जैमिनी ज्योतिष या विशिष्ट गूढ़ अध्ययनों में उपयोग किए जाते हैं। व्यवहारिक (Practical) फलादेश के लिए D-60 तक की कुंडलियाँ सबसे अधिक प्रासंगिक मानी जाती हैं।

D-81 (नवनवमांश - Navanavamsa)

  • विभाजन: 81

  • फलादेश: यह नवमांश (D-9) के फलों को और सूक्ष्मता से देखता है। इसका उपयोग पूर्व जन्मों से प्राप्त ज्ञान और आध्यात्मिक समझ की गहराई को देखने के लिए किया जाता है।

  • नियम: D-81 के त्रिकोण भावों (1, 5, 9) में स्थित बृहस्पति और बुध व्यक्ति को उच्च कोटि का ज्ञान और बुद्धिमत्ता देते हैं।

D-108 (अष्टोत्तरांश - Ashtottaramsa)

  • विभाजन: 108

  • फलादेश: यह जीवन के समग्र भाग्य और जातक के आध्यात्मिक विकास के अंतिम स्तर को दर्शाता है। 108 संख्या को वैदिक परंपरा में अत्यंत शुभ माना जाता है।

  • नियम: D-108 में केंद्र और त्रिकोण स्वामियों का संबंध जीवन के सामान्य भाग्य और दैवीय सहायता को बढ़ाता है।

D-144 (द्वादशद्वादशांश - Dwadashadwadashamsha)

  • विभाजन: 144

  • फलादेश: यह सभी बारह भावों के अंतिम परिणामों की पुष्टि करता है। यह जातक के जीवन के सबसे दीर्घकालिक परिणामों (Long-term results) और अंततः मोक्ष या मुक्ति के विषय को देखने के लिए उपयोग किया जाता है।

  • नियम: D-144 में द्वादश भाव के स्वामी (मोक्ष का भाव) का बलवान होना व्यक्ति के जीवन के अंतिम लक्ष्य की पूर्ति को दर्शाता है।

निष्कर्ष: वैदिक ज्योतिष में फलादेश की सटीकता वर्ग चार्ट्स की गहराई में छिपी है। D-60 (षष्ट्यंश) का विश्लेषण जातक के गहन कर्मों को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, जबकि D-40 और D-45 क्रमशः मातृ और पितृ वंश से प्राप्त भाग्य का सूक्ष्म चित्रण करते हैं।

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