वर्ग चार्ट (विभागीय कुंडली): D-11 से D-30 तक फलादेश के गहन नियम

 

वर्ग चार्ट (विभागीय कुंडली): D-11 से D-30 तक फलादेश के गहन नियम

यह दस्तावेज़ वैदिक ज्योतिष के उच्च विभागीय कुंडलियों—D-11 (रुद्रांश) से D-30 (त्रिंशांश) तक—के फलादेश (Predictive Interpretation) के विशेष और गहन नियमों पर केंद्रित है। ये चार्ट व्यक्ति के लाभ, हानि, माता-पिता, वाहन, आध्यात्मिकता और व्यक्तिगत संकटों के सूक्ष्म पहलुओं को दर्शाते हैं।

फलादेश का मूल सिद्धांत

इन उच्च वर्ग चार्ट्स (D-N) से फलादेश करते समय, तीन मुख्य बिंदुओं का विश्लेषण अनिवार्य है:

  1. D-N लग्न और लग्नेश का बल: वर्ग चार्ट का लग्न स्वामी (Lagna Lord) जितना बलवान (केंद्र/त्रिकोण में, उच्च/स्वराशि में) होगा, उस क्षेत्र में उतना ही शुभ फल प्राप्त होगा।

  2. D-1/D-N संबंध (भावात्-भावम्): D-1 (जन्म कुंडली) के संबंधित भाव का स्वामी D-N में किस भाव में गया है, यह उसके फल की तीव्रता को दर्शाता है।

  3. कारक ग्रह (Karaka): उस विशिष्ट क्षेत्र का नैसर्गिक कारक ग्रह D-N में कैसा प्रदर्शन कर रहा है।

1. रुद्रांश (D-11): लाभ, हानि, संकट और बड़े लक्ष्य

रुद्रांश चार्ट (D-11) व्यक्ति की आय, लाभ (Gains), बड़े लक्ष्य की पूर्ति, और जीवन में आने वाली अचानक बड़ी हानि या विनाशकारी घटनाओं को दर्शाता है। इसे 'लाभ/हानि' का चार्ट भी कहते हैं।

फलादेश नियम

व्याख्या और परिणाम

D-11 लग्न स्वामी

D-11 लग्नेश का बलवान होना व्यक्ति को बड़े लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें प्राप्त करने की क्षमता देता है।

आय का भाव

D-11 का द्वितीय भाव (धन भाव) व्यक्ति की आय के प्राथमिक स्रोतों और बचत करने की क्षमता को दर्शाता है।

लाभ का कारक

D-11 में नैसर्गिक कारक बृहस्पति (लाभ का कारक) और शुक्र (धन और सुख का कारक) का बलवान होना जबरदस्त वित्तीय लाभ और इच्छापूर्ति को दर्शाता है।

D-1 एकादशेश का स्थान

D-1 के 11वें भाव के स्वामी (लाभेश) की D-11 में स्थिति यह बताती है कि व्यक्ति को किस क्षेत्र या स्रोत से सबसे बड़ा लाभ मिलेगा।

राहु और शनि का संबंध

D-11 में राहु या शनि का 11वें भाव से संबंध अनैतिक या गुप्त स्रोतों से बड़े लाभ का संकेत दे सकता है, लेकिन अंततः यह अचानक हानि (D-11 का 8वां या 12वां भाव) भी करा सकता है।

2. द्वादशांश (D-12): माता-पिता, पैतृक संबंध और विरासत

द्वादशांश चार्ट (D-12) माता-पिता, उनका स्वास्थ्य और आयु, पूर्वजों की विरासत, और वृद्धावस्था के जीवन को देखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

फलादेश नियम

व्याख्या और परिणाम

माता-पिता कारक

D-12 में सूर्य (पिता) और चंद्रमा (माता) की स्थिति उनके स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख को दर्शाती है। यदि ये ग्रह बलवान हों, तो माता-पिता का सुख लंबा और अच्छा मिलता है।

D-1 चतुर्थेश/नवमेश

D-1 के चतुर्थ भाव के स्वामी (माता) और नवम भाव के स्वामी (पिता) का D-12 में बलवान होना माता-पिता के भाग्य और सुख को बढ़ाता है।

पैतृक विरासत

D-12 के द्वितीय भाव और अष्टम भाव का बल विरासत, पैतृक संपत्ति, और पूर्वजों के आशीर्वाद को दर्शाता है।

वृद्धावस्था

D-12 का लग्न और लग्नेश वृद्धावस्था में व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक स्थिति को दर्शाता है।

अशुभ प्रभाव

D-12 में त्रिक भावों (6, 8, 12) का बलवान होना माता-पिता के स्वास्थ्य या उनसे संबंधों में कष्ट दे सकता है।

3. षोडशांश (D-16): वाहन, सुख-सुविधाएँ और आराम

षोडशांश चार्ट (D-16) व्यक्ति के जीवन में प्राप्त होने वाले सभी प्रकार के सुख, आराम (Comforts), वाहन और अचल संपत्ति से जुड़े आनंद को दर्शाता है।

फलादेश नियम

व्याख्या और परिणाम

D-16 लग्नेश का बल

D-16 लग्नेश का बलवान होना व्यक्ति के जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं की प्रचुरता को दर्शाता है।

सुख का भाव

D-16 का चतुर्थ भाव (सुख का भाव) वाहन, घर और सामान्य जीवन के आराम को दर्शाता है।

कारक ग्रह

D-16 में शुक्र (वाहन और भोग का कारक) और चंद्रमा (सुख और मानसिक शांति का कारक) का बलवान होना उत्तम वाहन सुख, विलासिता और मानसिक संतुष्टि देता है।

वाहन हानि

D-16 के चतुर्थ भाव पर शनि या मंगल का अशुभ प्रभाव वाहन की क्षति, दुर्घटना या सुख-सुविधाओं में कमी का कारण बन सकता है।

D-1 चतुर्थेश का स्थान

D-1 के चतुर्थेश का D-16 में केंद्र या त्रिकोण में होना व्यक्ति को कम उम्र में ही घर और वाहन का सुख दिलाता है।

4. विंशांश (D-20): आध्यात्मिकता, उपासना और मोक्ष

विंशांश चार्ट (D-20) जातक की धार्मिक प्रवृत्ति, पूजा-पाठ में रुचि, आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति, और किस देवी-देवता के प्रति उसका झुकाव रहेगा, यह दर्शाता है।

फलादेश नियम

व्याख्या और परिणाम

धर्म का भाव

D-20 में नवम भाव (धर्म) और द्वादश भाव (मोक्ष/मुक्ति) का विश्लेषण अनिवार्य है।

कारक ग्रह

D-20 में बृहस्पति (गुरु) की बलवान स्थिति आध्यात्मिक मार्गदर्शन, सत्य की खोज और धार्मिक क्रियाकलापों में सफलता देती है।

सूर्य और शनि का संबंध

D-20 में सूर्य का बलवान होना जातक को राजकीय या सार्वजनिक धार्मिक कार्यों में नेतृत्व देता है, जबकि शनि का संबंध एकांत साधना और तपस्या की ओर प्रेरित करता है।

इष्ट देवता

D-20 के लग्नेश, पंचमेश और नवमेश जिस राशि में हों, उनके स्वामी और कारक ग्रह (जैसे शुक्र - देवी, मंगल - हनुमान) इष्ट देवता का संकेत देते हैं।

आध्यात्मिक सिद्धि

D-20 में केंद्र-त्रिकोण स्वामियों का संबंध या केमद्रुम योग न होना व्यक्ति को आध्यात्मिक सिद्धि (Siddhi) की ओर ले जाता है।

5. चतुर्विंशांश (D-24): विद्या, ज्ञान और बौद्धिक क्षमता

चतुर्विंशांश चार्ट (D-24) या सिद्धांश व्यक्ति की शिक्षा, बौद्धिक क्षमता, ज्ञान की गहराई, सीखने की प्रवृत्ति और अकादमिक सफलता को दर्शाता है।

फलादेश नियम

व्याख्या और परिणाम

D-24 लग्नेश

D-24 लग्न स्वामी का बलवान होना व्यक्ति की मेमोरी (स्मरण शक्ति) और ज्ञान अर्जित करने की क्षमता को दर्शाता है।

शिक्षा का भाव

D-24 में चतुर्थ भाव (प्राथमिक शिक्षा) और नवम भाव (उच्च शिक्षा) का बलवान होना अकादमिक सफलता देता है।

कारक ग्रह

बुध (बुद्धि और गणना) और बृहस्पति (ज्ञान और दर्शन) की स्थिति D-24 में मजबूत होने पर जातक एक विद्वान और ज्ञानी होता है।

विषय का चुनाव

D-24 में 5वें और 9वें भाव के स्वामियों का संबंध यह बताता है कि जातक किस विषय (जैसे शनि - इंजीनियरिंग, बुध - कॉमर्स, गुरु - कानून) में विशेषज्ञता प्राप्त करेगा।

शिक्षा में बाधा

D-24 में शनि का चतुर्थ या नवम भाव पर दृष्टि डालना शिक्षा में विलंब, रुकावट या संघर्ष को दर्शाता है।

6. त्रिंशांश (D-30): दुर्भाग्य, संकट और अनैतिक प्रभाव

त्रिंशांश चार्ट (D-30) जीवन के सबसे खराब पहलुओं—दुर्भाग्य, संकट, अचानक बड़ी हानि, और दुष्टता (Evil Effects) के प्रभावों को देखने के लिए उपयोग किया जाता है। यह चार्ट महिलाओं की कुंडली में विशेष रूप से स्वास्थ्य और चरित्र के लिए महत्वपूर्ण है।

फलादेश नियम

व्याख्या और परिणाम

D-30 लग्न की स्थिति

D-30 लग्न का स्वामी यदि D-1 में कमजोर (नीच, 6, 8, 12 में) हो, तो जीवन में संघर्ष और दुर्भाग्य की मात्रा बढ़ जाती है।

अशुभता का विश्लेषण

D-30 में यदि कोई ग्रह अपनी नीच राशि या शत्रु राशि में हो, तो उस ग्रह की दशा में उससे संबंधित सबसे खराब फल प्राप्त होते हैं।

रोग/चोट

D-30 में मंगल और शनि की स्थिति शारीरिक चोट, सर्जरी या गंभीर रोग का भय दर्शाती है, खासकर यदि D-1 में ये 6, 8, 12 भावों के स्वामी हों।

स्त्री कुंडली

D-30 में लग्न या सप्तम भाव पर पाप ग्रहों (राहु, केतु) का प्रभाव वैवाहिक जीवन में तनाव, स्वास्थ्य समस्याएं या चरित्र पर सवाल खड़े कर सकता है।

D-1 से संबंध

D-1 लग्नेश का D-30 के 8वें भाव में जाना गुप्त शत्रुओं या आकस्मिक संकटों का सामना कराता है।

निष्कर्ष: उच्च वर्ग चार्ट्स का विश्लेषण व्यक्ति के जीवन के सूक्ष्म और आध्यात्मिक आयामों को समझने में मदद करता है। इनकी सटीकता के लिए जन्म समय का शुद्ध होना अत्यंत आवश्यक है।

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