वर्ग चार्ट (विभागीय कुंडली): D-5 से D-10 तक फलादेश के गहन नियम
यह दस्तावेज़ वैदिक ज्योतिष के सबसे महत्वपूर्ण वर्ग चार्ट्स—D-5 (पंचमांश) से D-10 (दशमांश) तक—के फलादेश (Predictive Interpretation) के गहन नियमों पर केंद्रित है। ये चार्ट व्यक्ति के भाग्य, ज्ञान, संतान, स्वास्थ्य और कर्म क्षेत्र के सूक्ष्म आयामों को दर्शाते हैं।
फलादेश का मूल सिद्धांत
किसी भी वर्ग चार्ट (D-N) से फलादेश करते समय, तीन मुख्य बिंदुओं का विश्लेषण अनिवार्य है:
D-N लग्न और लग्नेश: वर्ग चार्ट का लग्न स्वामी (Lagna Lord) कितना बलवान है। यदि यह ग्रह D-N में केंद्र, त्रिकोण, या अपनी उच्च/स्वराशि में हो, तो उस क्षेत्र में शुभ फल मिलता है।
D-1/D-N संबंध: D-1 (जन्म कुंडली) का स्वामी (लग्नेश) या किसी भाव का स्वामी D-N में किस भाव में गया है।
कारक ग्रह (Karaka): उस विशिष्ट क्षेत्र का नैसर्गिक कारक ग्रह (जैसे संतान के लिए बृहस्पति) D-N में कैसा प्रदर्शन कर रहा है।
1. पंचमांश (D-5): पूर्व पुण्य, प्रसिद्धि और प्रतिभा
पंचमांश चार्ट (D-5) जातक की सहज प्रतिभा (Innate Talent), पूर्व जन्म के कर्म (Purva Punya), प्रसिद्धि प्राप्त करने की क्षमता और मंत्रों की सिद्धि को दर्शाता है।
फलादेश नियम | व्याख्या और परिणाम |
|---|---|
D-5 लग्न की स्थिति | D-5 लग्न का स्वामी यदि D-1 के पंचम भाव या नवम भाव में बलवान हो, तो व्यक्ति पूर्व जन्म के शुभ कर्मों के कारण सहज प्रतिभा और प्रसिद्धि पाता है। |
सूर्य और बृहस्पति | D-5 में सूर्य की बलवान स्थिति (उच्च, स्वराशि) व्यक्ति को सार्वजनिक जीवन में बड़ी प्रसिद्धि और सम्मान दिलाती है, खासकर रचनात्मक या आध्यात्मिक क्षेत्रों में। |
त्रिकोण (1, 5, 9) का बल | D-5 में 1, 5, और 9वें भावों में स्थित शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, चंद्रमा) पूर्व पुण्य बल को बढ़ाते हैं और व्यक्ति को सहज सफलता मिलती है। |
बुध का संबंध | यदि D-5 में बुध बलवान हो, तो जातक को मंत्रों में रुचि, बौद्धिक कार्यों में सफलता और उत्कृष्ट भाषण कला (वाक् सिद्धि) मिलती है। |
अशुभ प्रभाव | D-5 में शनि या राहु का लग्न या पंचम भाव से संबंध होने पर, व्यक्ति को अपनी प्रतिभा को निखारने में अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है। |
2. षष्ठांश (D-6): रोग, ऋण और संघर्ष
षष्ठांश चार्ट (D-6) व्यक्ति के रोगों, कर्ज, शत्रुओं और जीवन में आने वाली अचानक बाधाओं का गहन विश्लेषण करता है।
फलादेश नियम | व्याख्या और परिणाम |
|---|---|
D-6 लग्नेश का D-1 में स्थान | D-6 लग्न का स्वामी यदि D-1 के त्रिक भावों (6, 8, 12) में हो, तो व्यक्ति को उस भाव से संबंधित रोगों और संघर्षों का सामना करना पड़ता है। |
त्रिक भावों का स्वामी | D-6 में षष्ठम भाव (6th house) का स्वामी यदि केंद्र या त्रिकोण में बलवान हो जाए, तो यह बीमारी से लड़ने की जबरदस्त क्षमता (Immunity) या दुश्मनों पर विजय दिलाता है। |
शनि और मंगल | D-6 में शनि की स्थिति दीर्घकालिक (Chronic) रोगों को दर्शाती है, जबकि मंगल तीव्र (Acute) रोग, दुर्घटनाएँ या सर्जरी को दर्शाता है। |
उपाय का भाव | D-6 में 12वाँ भाव रोगमुक्ति और अंतिम उपचार को दर्शाता है। यदि 12वें भाव का स्वामी बलवान हो, तो रोग गंभीर होने पर भी निदान मिल जाता है। |
रोग का समय | D-6 में 6वें, 8वें या 12वें भाव के स्वामी की दशा-अंतर्दशा में रोग, ऋण या शत्रु पक्ष से कष्ट मिलता है। |
3. सप्तमांश (D-7): संतान, प्रजनन और उनका भविष्य
सप्तमांश चार्ट (D-7) संतान की संख्या, उनका लिंग, उनकी प्राप्ति का समय, और बच्चों के भविष्य व उनकी प्रतिभा को दर्शाता है।
फलादेश नियम | व्याख्या और परिणाम |
|---|---|
D-7 लग्न और लग्नेश | D-7 लग्न और इसके स्वामी का बल संतान सुख की मात्रा को दर्शाता है। यदि लग्नेश बलवान हो, तो संतान आसानी से होती है। |
विषम/सम राशि का नियम | D-7 में विषम राशि में स्थित ग्रह पुत्र संतान और सम राशि में स्थित ग्रह पुत्री संतान को दर्शाते हैं। ग्रहों के बल के अनुसार संतान का लिंग निर्धारित होता है। |
संतान का कारक | D-7 में नैसर्गिक कारक बृहस्पति (पुरुष) और शुक्र (स्त्री) की स्थिति संतान की संख्या और सुख को प्रभावित करती है। |
बाधा का भाव | D-7 में 7वाँ भाव (पति/पत्नी का भाव) संतान प्राप्ति में किसी भी प्रकार की बाधा या समस्या को दर्शाता है, जिसे सप्तमेश की स्थिति से देखा जाता है। |
संतान का भाग्य | D-7 के पंचमेश या नवमेश का D-10 (दशमांश) में बलवान होना बच्चों के उज्जवल भविष्य और करियर की सफलता को दर्शाता है। |
4. अष्टमांश (D-8): अप्रत्याशित संकट, दीर्घायु और विरासत
अष्टमांश चार्ट (D-8) अचानक आने वाली आपदाओं, दीर्घायु (Longevity), विरासत (Inheritance) और अप्रत्याशित संकटों को देखने के लिए उपयोग किया जाता है।
फलादेश नियम | व्याख्या और परिणाम |
|---|---|
दीर्घायु का नियम | D-8 में लग्न स्वामी और अष्टम स्वामी का परस्पर संबंध व्यक्ति की दीर्घायु और जीवन शक्ति को निर्धारित करता है। |
विरासत (Inheritance) | D-8 में द्वितीय भाव (धन), अष्टम भाव (अचानक लाभ) और उनके स्वामियों का संबंध विरासत, बीमा लाभ या अचानक धन प्राप्ति को दर्शाता है। |
शनि का संबंध | D-8 में शनि का बलवान होना दीर्घायु देता है, लेकिन यदि वह कमजोर हो तो दीर्घकालिक रोग या कानूनी विवादों से संकट आता है। |
अशुभ घटनाएं | D-8 में मारकेश (2nd, 7th lord) की दशा-अंतर्दशा में अप्रत्याशित संकट, दुर्घटना या स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं आ सकती हैं। |
D-1 से संबंध | D-1 लग्नेश का D-8 के 8वें भाव में जाना व्यक्ति को गुप्त विद्याओं या रिसर्च में रुचि देता है, लेकिन शारीरिक कष्ट भी दे सकता है। |
5. नवमांश (D-9): विवाह, जीवन साथी और समग्र भाग्य
नवमांश (D-9) को जन्म कुंडली के बाद सबसे महत्वपूर्ण चार्ट माना जाता है। यह विवाह, पति/पत्नी का स्वभाव, जीवन का सामान्य भाग्य और दशाओं के अंतिम फल को निर्धारित करता है।
फलादेश नियम | व्याख्या और परिणाम |
|---|---|
दशा का अंतिम फल | कोई भी ग्रह अपनी दशा में फल उसी तरह देगा, जैसे वह D-9 में स्थित है। D-9 में बलवान ग्रह शुभ दशा फल देता है, भले ही वह D-1 में कमजोर हो। |
जीवन साथी | D-9 का सप्तम भाव और उसका स्वामी जीवन साथी का रंग-रूप, स्वभाव और सामाजिक स्तर दर्शाता है। |
विवाह का कारक | D-9 में शुक्र (पुरुष के लिए) और बृहस्पति/मंगल (स्त्री के लिए) की बलवान स्थिति सफल वैवाहिक जीवन सुनिश्चित करती है। |
विवाह में बाधा | D-9 में 7वें भाव में अशुभ ग्रहों (राहु, शनि) का होना विवाह में विलंब या वैवाहिक जीवन में तनाव दर्शाता है। |
वर्गीत्तम (Vargottama) | यदि कोई ग्रह D-1 और D-9 दोनों में एक ही राशि में हो, तो वह वर्गीत्तम कहलाता है। यह ग्रह अत्यंत बलवान होकर अपने कारक तत्वों के शुभ फल अवश्य देता है। |
6. दशमांश (D-10): करियर, व्यवसाय और कर्म क्षेत्र
दशमांश चार्ट (D-10) व्यक्ति के व्यावसायिक जीवन, करियर में सफलता, पद, मान-सम्मान, कार्यक्षेत्र और सामाजिक स्थिति को दर्शाता है।
फलादेश नियम | व्याख्या और परिणाम |
|---|---|
करियर की दिशा | D-10 का लग्न स्वामी D-1 में जिस भाव का स्वामी है और जिस भाव में बैठा है, वह व्यक्ति के करियर की दिशा और कार्यक्षेत्र को बताता है। |
राजयोग (D-10) | D-10 में दशम भाव के स्वामी का दशमेश के साथ संबंध या केंद्र-त्रिकोण स्वामियों का संबंध होने पर व्यक्ति करियर में उच्च पद और सरकारी सम्मान प्राप्त करता है। |
करियर कारक | शनि (कर्म), सूर्य (सत्ता) और बुध (व्यापार) D-10 में बलवान होने पर व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्रों में नेतृत्व और सफलता प्राप्त करते हैं। |
कार्यस्थल का माहौल | D-10 का चतुर्थ भाव (D-10 लग्न से 4th) कार्यस्थल का माहौल और सहयोगियों से संबंध दर्शाता है। शुभ ग्रहों का प्रभाव सुखद माहौल देता है। |
दशा और करियर | D-10 में किसी भी त्रिकोण (1, 5, 9) या केंद्र (1, 4, 7, 10) के स्वामी की दशा व्यक्ति को करियर में बड़ी सफलता और पदोन्नति देती है। |
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